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आचार्य श्रीराम शर्मा >> ब्रह्मवर्चस् साधना की ध्यान-धारणा

ब्रह्मवर्चस् साधना की ध्यान-धारणा

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :144
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4270
आईएसबीएन :0000

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ब्रह्मवर्चस् की ध्यान धारणा....

३. (घ) चक्र श्रृंखला का वेधन जागरण

 


काय-कलेवर में तो असंख्य शक्ति संस्थान हैं। प्रसुप्त स्थिति में वे मृतवत् पड़े रहते हैं, पर जब वे जागृत होते हैं तो अपना पराक्रम क्रुद्धसिंह की तरह दिखाने लगते हैं। देव वरदान या सिद्धि चमत्कार के नाम से जानी जाने वाली विभूतियों के संबंध में समझा जाता है कि वे किसी बाहरी सत्ता के अनुग्रह का प्रतिफल हैं और वे सौभाग्य की तरह कहीं से अनुनय, विनय के आधार पर मिलती हैं। पर वस्तुतः ऐसा होता नहीं। वे अपने ही अंतर्जगत की प्रखरता के साथ प्रकट होने वाली उपलब्धियाँ भर होती हैं। आत्मजागरण और ईश्वरीयअनुग्रह को अविच्छिन्न समझा जा सकता है।

साधना द्वारा जिन शक्ति संस्थानों को जगाया जा सकता है और जीवन के अनेक क्षेत्रों में जिनका चमत्कार देखा जा सकता है, उनकी संख्या अगणित है, पर इनमें छह प्रमुख हैं। इन्हें षटचक्र कहते हैं । मूलाधार मेरुदंड के सबसे नीचे के भाग में है और सहस्रार सबसे ऊपर वाले छोर पर है। इनके मध्य में स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत और विशुद्धि चक्र हैं। इस प्रकार मेरुदंड मार्ग में छह की संख्या पूरी हो जाती है। यहाँ एक शास्त्रीय विकल्प-मतभेद चला आता है। आज्ञा चक्र को षटचक्रों में सम्मिलित किया जाय तो सहस्रार को केंद्रीयसत्ता ठहराना पड़ेगा। यदि सहस्रार को षटचक्रों में गिनते हैं तो आज्ञाचक्र को झरोखा, खिड़की, सर्चलाइट नाम देकर उसकी गणना अलग से करनी पडेगी। आज्ञाचक्र और सहस्रार दोनों को ही शक्ति चक्रों की श्रृंखला में गिन लिया जाय तो उनकी संख्या सात होती है। यह छह और सात का झंझट है। वस्तुत: यह सभी चक्र दिव्य-शक्तियों के अत्यंत प्रभावोत्पादक संस्थान है। इनमें से न किसी का महत्त्व कम है और न प्रगति के पथ पर अग्रगामी आत्मचेतना इनमें से किसी की उपेक्षा कर सकती है। हमें दोनों ही गणनाओं को मान्यता देनी चाहिए, किंतु लाभांवित सातों से होना चाहिए।

पुराणों में षटचक्रों को शंकर जी (शिव) एवं पार्वती (शक्ति) के पुत्र षट्मुखी कार्तिकेय के रूप में चित्रित किया गया है। उन्हें अग्नि ने अपने गर्भ में रखा और छह कृतिकाओं ने पालन किया था। ठंड होते ही उन्होंने दैत्यों को निरस्त किया है और देव शक्तियों को स्वर्गीय क्षेत्र का आधिपत्य वापिस दिलाने में भारी योगदान दिया। इस कथानक का विस्तृत वर्णन पुराणकारों ने जिस ढंग से किया है उससे स्पष्ट है कि यह मेरुदंड स्थित षटचक्रों के स्वरूप, रहस्य एवं प्रतिफल का ही कथापरक चित्रण है।

सात की गणना भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। सप्तद्वीप, सप्त समुद्र, सप्तलोक, सप्तऋषि, सूर्य रथ के सप्त अश्व आदि के स्वरूप एवं महत्त्व को यदि ठीक तरह पढ़ा जाय तो उन उपाख्यानों में सप्त चक्रों में सन्निहित क्षमता एवं जागरण की प्रतिक्रिया का सहज ही परिचय मिलता है। काया को यों 'पिंड' कहते हैं, पर यदि उसकी दिव्य क्षमता के विस्तार पर दृष्टि डाली जाय तो वह एक पूरा ब्रह्मांड ही कहा जा सकता है।

यह चक्र मेरुदंड मार्ग में अवस्थित है। आज्ञाचक्र यों भ्रूमध्य भाग में माना जाता है, पर वस्तुतः वह भी इस स्थान की सीध में थोड़ी गहराई में अवस्थित है। सहस्रार को सूर्य माना जाय तो आज्ञा चक्र को उसका उपग्रह चंद्रमा कहा जा सकता है। दोनों परस्पर अति घनिष्टता से संबद्ध हैं और अति समीप भी हैं। अस्तु दोनों को ही मेरुदंड के उच्च भाग से संबंधित मान लिया जाय और सातों को मेरुदंड से संबंधित मान लिया जाय तो इसमें किसी प्रकार की अड़चन नहीं है। इतने पर भी जब चक्रों के जागरण का प्रश्न आता है तो उनकी संख्या छह ही मानी जाती है। सातवाँ सहस्रार जागरण का केंद्र और ब्रह्म का प्रत्यक्ष प्रतीक मान लिया जाता है। जागरण के लिए तो षटचक्रों पर ही जोर दिया जाता है।

मलाधार से जब कंडलिनी शक्ति जागृत होती है तो वह ऊपर उठती है। गर्मी पाकर हवा ऊपर को ही उठती है। बादल बनने और चक्रवात उठने की क्रिया में यह प्रत्यक्ष देखा जा सकता है कि गर्मी का एक कार्य संबंधित वस्तुओं को ऊपर उठाना भी है। शक्ति जागरण का ऊर्ध्वगामी हो जाना सहज सुलभ नहीं है। इसके मार्ग में अवरोध भी हैं, जिनसे निपटना पड़ता है। इन्हें लंबी यात्रा के मार्ग में पडने वाले मील के पत्थर या विश्राम-गृह या उपाहार गृह भी कह सकते हैं। चक्र-जागरण को चक्र-वेधन भी कहते हैं। जिस प्रकार बिखरे फूलों को-बिखरे मोतियों को वेध कर एक सूत्र में पिरोया जाता है और उनकी माला बनती है, उसी प्रकार इस चक्र-वेधन प्रक्रिया को भी समझा जा सकता है। बिखराव को संघबद्धता में परिणत कर देने पर जो प्रतिफल उत्पन्न होता है, वही चक्र-वेधन प्रक्रिया का भी होता है।

भूमि का वेधन करके गहराई में उतरते जाने पर ही जल स्रोत, धातुएँ, खनिज पदार्थ, तेल आदि की उपलब्धियाँ हस्तगत होती हैं। काय-कलेवर भी एक प्रकार से भू-लोक ही है। उनमें जो संपदाएँ दबी हैं, उनमें कुछ परम उपयोगी षटचक्रों के रूप में जानी जाती हैं। घर वालों को सोते हुए देखकर चोर घर में घुसते, घात लगाते और हानि पहुँचाते हैं। ठीक इसी प्रकार प्रसुप्त चक्रों की निस्तब्धता देखकर षटरिपु, दुति दस्युओं की तरह भीतर घुस पड़ते हैं। आंतरिक षटरिपुओं को काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर कहा गया है। बाहरी शत्रु तो बाहरी हानि ही पहुँचा सकते हैं, पर ये आंतरिक शत्रु तो सारे अंत:क्षेत्र को ही खोखला करते और भविष्य को अंधकारमय बनाते हैं। जैसे-जैसे जागृति आती है, वैसे-वैसे इन शत्रुओं का पलायन होने लगता है। प्रकाश का प्रभात उगते ही निशाचर अपनीअपनी कोतरों में जा छिपते हैं। हिंस्र पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े, चोर आदि प्रायः रात में ही घात लगाते हैं और दिन निकलते ही अपनी हरकतें बंद कर देते हैं। आंतरिक ट्रिपुओं के बारे में भी यही बात है। पशु-प्रवृत्तियों का निराकरण न हो सकने के कारण आत्मिक प्रगति प्रायः रुकी ही पड़ी रहती है। कुंडलिनी जागरण के तृतीय चरण में षटचक्रों के शोधन, वेधन, जागरण प्रक्रिया के साथ-साथ यह अवरोधों के निवारण का उद्देश्य भी पूरा होने लगता है।

भगवान राम ने बालि वध की सामर्थ्य का परिचय देने के लिए सुग्रीव को सात ताड़ों का वेधन एक ही वाण में करके दिखाया था। चक्रवेधन को उसी के समतुल्य आत्मिक पराक्रम कहा जा सकता है। यह कुंभकरण को जगाने के सदृश है। विष्णु भगवान शेषशैय्या पर प्रसुप्त स्थिति में पड़े रहते हैं, पर वे जागृत किए जा सकें तो समय-समय पर अवतार लीलाओं का पराक्रम देखते हैं। आत्मसत्ता भी प्रसुप्त पड़ी हुई उपहास्यापद बनी रहती है, पर यदि उसे कुंडलिनी जागरण जैसे साधना प्रयोगों द्वारा जागृत किया जा सके तो उसकी दिव्य सक्रियता देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ेगा।

चक्र जागरण को समग्र आत्म-जागृति का खंड प्रयास कह सकते हैं। लंबी यात्रा एक बारगी नहीं हो सकती, उसके बीच-बीच में विराम लेने होते हैं। रेलगाडी स्टेशनों पर रुकती हई गंतव्य स्थान तक पहुँचती है। चक्रों को ऐसे ही विराम केंद्र कहा जा सकता है, जहाँ पिछले श्रम की थकान मिटाने और अगली यात्रा के लिए सामर्थ्य प्राप्त करने की सुविधा मिलती है। इस प्रयास में जो लाभ मिलने चाहिए वे भी प्राप्त होते चलने से स्कूली छात्रों को इनाम , उपहार देकर अधिक उत्साह से पढ़ने की प्रेरणा मिलने जैसा प्रसंग भी बन जाता है। चक्रों का जिस अनुपात से जागरण होता है,उसी क्रम से वे आत्मिक विभूतियाँ उभरती चली आती है, जिन्हें ऋद्धिसिद्धियों के नाम से जाना जाता है।

चक्रवेध के समतुल्य और भी कई शब्द है, जैसे-लक्ष्य-वेध, शब्द-वेध, चक्रव्यूह-वेध। इन वेधन कर्मों में कई महत्त्वपूर्ण सफलताएँ छिपी हुई हैं। लक्ष्य-वेध निशाना मारने को कहते हैं। युद्ध जीतने में, शत्रु को परास्त करने में, सही निशाना लगने का बहुत महत्त्व है। योजना बनाते समय लक्ष्य निर्धारित किया जाता है और उसकी प्राप्ति के लिए तत्परतापूर्वक प्रयत्न में जुटा जाता है। जीवन का लक्ष्य पूर्णता की प्राप्ति है। इसी प्रकार अन्य अनेक उद्देश्य हो सकते हैं, जिन्हें लक्ष्य कहा जाय। लक्ष्य-वेध से, लक्ष्य-प्राप्ति से जो प्रसन्नता एवं सफलता मिलती है, उसके लाभ तथा आनंद को सभी जानते हैं।

शब्दवेधी वाण की चर्चा सुनी जाती है। प्रभावशाली शब्दों से अंतरवेध डालने वाली बात से भी सभी परिचित हैं। नादयोग-शब्द योग है। शब्द ब्रह्म भी उसे कहते हैं। उसका वेधन ईश्वर प्राप्ति का ही एक प्रकार है। षटचक्रों के वेध को-चक्रवेध की-ऐसे ही शब्द वेध की उपमा दी जा सकती है।

चक्रव्यूह युद्ध कला की एक संरचना है। जिसमें प्रतिद्वंद्वी की घेराबंदी की जाती है। जंगली हाथियों को पकड़ने के लिए उन्हें चारों ओर से घेर कर एक छोटे घेरे में लाया और बंदी बनाया जाता है। शिकारियों को यही नीति अपनाते देखा गया है। वे सिंह, व्याघ्र आदि को चारों ओर से हंगामा मचा कर एक घेरे में समेटते लाते हैं और फिर उन्हें गोली का निशाना बनाते हैं। चक्रव्यूह एक युद्ध कला भी है। महाभारत में अभिमन्यु ऐसे ही व्यूह में फँसा था। इसी घेराबंदी को भव-बंधन कहते हैं। पराधीनता यही है। इसी से छुटकारा पाने को मुक्ति या मोक्ष कहते हैं। दुष्प्रवृत्तियों और दुर्भावनाओं की घेराबंदी मंी फँसा हुआ प्राणी जाल में फँसे पक्षी की तरह तड़पते हुए प्राण गँवाता है। बहेलिया मृग को जाल में फँसाता है, मछुए आटे की गोली का लोभ देकर मछली को काँटे से वेधते हैं, ऐसी ही दर्गति असुरता के बधिक द्वारा जाल में फँसाये जीवात्मा की होती है। इन चक्रव्यूहों से बच निकलने का जिसे अवसर मिले उसे सौभाग्यशाली गिना जायगा। कुंडलिनी जागरण की चक्रवेध प्रक्रिया को चक्रव्यूह वेधन के समतुल्य माना जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति नहीं है।

कुंडलिनी जागरण की ध्यान-धारणा के तीसरे चरण में षटचक्रों का वेधन आता है। इस संदर्भ में यह भाव चित्र स्पष्ट किया जाता है कि मूलाधार केंद्र में मंथन प्रक्रिया के कारण प्राण ऊर्जा जागृत होती और ऊपर उठती है। मेरुदंड मार्ग में होती हुई वही सहस्रार तक पहुँचती है। इस मार्ग के मध्यवर्ती मोर्चों को उसे जीतना पड़ता है। विराम स्थलों पर ठहरना पड़ता है और उपहार जीतने की प्रतिस्पर्धा में भाग लेना पडता है। बिखरे मोती समेटने और एक सूत्र में पिरोकर माला के रूप परिणत करने होते हैं। यही सब चक्रवेध की प्रक्रिया है। जिस प्रकार बरमा लकड़ी को, धरती को छेदते हुए आगे बढ़ता है, उसी प्रकार मूलाधार की जागृत प्राण शक्ति-कुंडलिनी सुषुम्ना मार्ग की इस चक्र श्रृंखला को अपनी प्रचंड क्षमता से वेधन करती हुई लक्ष्य प्राप्ति के लिए आगे बढ़ती है। इस ध्यान में संकल्प एवं विश्वास का गहरा पुट रहने से यह कल्पना करने जैसी तुच्छ दीखने वाली बात वस्तुतः प्रचंड सामर्थ्य सिद्ध होती है और वेधन के साथ जुड़े हुए समस्त उद्देश्यों की पूर्ति करती है।

ध्यान करें-मेरुदंड में सुषुम्ना एक प्रकाशवान नली ट्यूब की तरह। उसमें विशिष्ट शक्ति केंद्र नीचे मूलाधार, पेडू की सीध में-स्वाधिष्ठान, नाभि की सीध में-मणिपूर, हृदय की सीध में-अनाहत, कंठ की सीध में-विशुद्धि, भ्रू-मध्य की सीध मेंआज्ञाचक्र एवं सबसे ऊपर सहस्त्रार चक्र। ध्यान क्रमशः तेज ग्रंथियों के रूप में करें। मलाधार से योगाग्नि के ज्योति कण गोली की तरह छूटते हैं तथा उन चक्रों से टक्कर मारते हैं। चक्रों के शक्ति केंद्रों में हलचल एवं जागरण स्फुरण की अनुभूति होती है, उनसे शक्ति प्रवाह फूट पड़ते हैं।

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    अनुक्रम

  1. ब्रह्मवर्चस् साधना का उपक्रम
  2. पंचमुखी गायत्री की उच्चस्तरीय साधना का स्वरूप
  3. गायत्री और सावित्री की समन्वित साधना
  4. साधना की क्रम व्यवस्था
  5. पंचकोश जागरण की ध्यान धारणा
  6. कुंडलिनी जागरण की ध्यान धारणा
  7. ध्यान-धारणा का आधार और प्रतिफल
  8. दिव्य-दर्शन का उपाय-अभ्यास
  9. ध्यान भूमिका में प्रवेश
  10. पंचकोशों का स्वरूप
  11. (क) अन्नमय कोश
  12. सविता अवतरण का ध्यान
  13. (ख) प्राणमय कोश
  14. सविता अवतरण का ध्यान
  15. (ग) मनोमय कोश
  16. सविता अवतरण का ध्यान
  17. (घ) विज्ञानमय कोश
  18. सविता अवतरण का ध्यान
  19. (ङ) आनन्दमय कोश
  20. सविता अवतरण का ध्यान
  21. कुंडलिनी के पाँच नाम पाँच स्तर
  22. कुंडलिनी ध्यान-धारणा के पाँच चरण
  23. जागृत जीवन-ज्योति का ऊर्ध्वगमन
  24. चक्र श्रृंखला का वेधन जागरण
  25. आत्मीयता का विस्तार आत्मिक प्रगति का आधार
  26. अंतिम चरण-परिवर्तन
  27. समापन शांति पाठ

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